(1) धुरधाम के वासी अविनाशी, निज मौज से जब जब आते हैं

 

धुरधाम के वासी अविनाशीनिज मौज से जब जब आते हैं ।

भूले जीवों पर प्यारे गुरू, तब खूब दया बरसाते हैं ।

बचनामृत का प्याला भर भर, उनको खूब छकाते हैं ।

निज आशिक मतवाला कर, अपने फरमान सुनाते हैं ।

मन माया के पद तीन छुड़ा, आगे का भेद बताते हैं ।

निज पिंड से प्यार करा करके, घट में सतरूप दिखाते हैं ।

उस शब्द ज्योतिमय धारा में, निज नाम जहाज चलाते हैं।

जो भाग्यवान चढ़ जाते हैं, वे निज घर अपना पाते हैं ।

जो चढ़ न सके या छोड़ गिरे, वे भाग्यहीन कहलाते हैं ।

(2) कब तक रहोगे रूठे बिनती सुनो हमारी

 

कब तक रहोगे रूठे, बिनती सुनो हमारी ।

कुछ तो हमें बता दो, क्‍या भूल है हमारी 

सब लोक लाज छोड़ा, एक गुरू से नाता जोड़ा 

मुख मोड़ आप बैठे, बिगड़ी दशा हमारी 

पापी हृदय पिघल कर, आंखों से निकल आया 

इन आसुओं की माला, लो भेंट है तुम्हारी 

पतितों को तारते हो, पापों को क्षमा करके 

क्यों हो गुरूवर रूठे, आयी हमारी बारी ।

मैं भिक्षु हूँ तुम्हारा, दाता हो स्वामी मेरे ।

खाली न मुझको भेजो, होगी हंसी तुम्हारी ।

(3) अब अपना बना लो हमें सतगुरु प्यारे

 

अब अपना बना लो हमें सतगुरु प्यारे, 

रहूँ जिससे निर्भय सहारे तुम्हारे। 

जगत में है समरथ न कोई दिखाता, 

बताओ तुम्हीं किसके जाऊं दुआरे। 

यह माना कि सिर मेरे पापों की गठरी, 

मगर कौन बिन तेरे स्वामी उतारे। 

युगों से ये नैया भंवर में पड़ी है, 

दया करके अब तो लगा दो किनारे। 

अगर अब की डूबी तो गफलत न मेरी, 

दयालू शरण में हूँ आया तुम्हारे। 

है विश्वास अब की न डूबेगी नैया, 

जयगुरुदेव पतवार मेरी सम्हारे।

(4) घट घट में गुरु विराज रहे, कोई देखन वालो देखें

 

घट घट में गुरु विराज रहे, कोई देखन वालो देखें।

जन जन को गुरु पुकार रहे, कोई सुन ले तो गुरु भेटें।

पर वह पथ किसका देखा, जो पहुँचावे निज देशा |

गुरु बिन सब जीव भुलाय रहे, भटके चौरासी रीते।

बड़ भाग्य जीव का जागे, तब आवे सतगुरु आगे।

सतसंग के बचन पियारे लगें, तब सुरत शब्द में पागे।

मूरख क्या जानहि भेदा, गुरु को जिन मानुष देखा।

सतगुरु का वह सतरूप भला, ऐसे नर कैसे देखे।

मेरी अरज सुनो गुरु दाता, मोहि एक तुम्हारी आशा।

मेरे अन्दर आप बिराज रहो, मैं जयगुरुदेव भरोसे।

(5) बड़े वे भाग्यशाली हैं, जिन्हें गुरु याद करते हैं

 

बड़े वे भाग्यशाली हैं, जिन्हें गुरु याद करते हैं।

नहीं कम भाग्यशाली वे, जो उनसे प्यार करते हैं।

मेहर की दृष्टि सतगुरु डालते, इन पर सदा अपनी।

प्रेमियों पर दया सतगुरु इन्हीं में हो बरसते हैं।

गुरु दर्शन का फल, इन प्रेमियों से भी मिलने में।

पियासे एक चिल्लू जल से, ज्यों निज प्यास हरते हैं।

जो प्रेमी नित गुरु दर्शन, के हित हैं तरसते रहते।

ये मिलते जब उन्हें तो मौज, गुरु की वे समझते हैं।

वे इनके द्वारा गुरु, सन्देश पा करके हरषते हैं।

वे इनकी सेवा में, आनन्द गुरु सेवा की करते हैं।

दयालू सतगुरु उन प्रेमियों को नित्य भेजते रहना।

जो दृढ़ भक्ति के रंग में, प्रेमियों को नित्य रंगते हैं।

(6) कर ले निज काज जवानी में, इस दो दिन की जिन्दगानी में 

 

कर ले निज काज जवानी में, इस दो दिन की जिन्दगानी में।
मेहमान जवानी जाती है, फिर लौट कभी नहीं आती है।
हे मूढ़ इसे मत खो देना, तू किस्से और कहानी में।
सौभाग्य से यह नर तन पाया है, सतगुरु जगाने आया है।
भगवान इसी में मिलते हैं, क्यों ढूंढ़े पत्थर पानी में।
तू इससे खोज गुरु की कर, मिल जायें तो न किसी से डर।
गुरु समर्थ ही दाता हैं सुन ले क्या कहते बानी में।
क्यों इसको पाकर भटक रहा, कर्तव्यों को भी भूल रहा।
इन भोगों से मुख मोड़ देख, फिर फर्क मूर्ख क्या ज्ञानी में।
ज्ञानी ईश्वर का प्यारा है, सेवक गुरु भक्त दुलारा है।
जो गुरु कहते मान उसे और कर भक्ति इस मर्दानी में।

(7) दुनिया के राहगीरों, क्या सन्त कह रहे हैं

 

दुनिया के राहगीरों, क्या सन्त कह रहे हैं।
मन माया इन्द्रियां सब, तोहि लूट ले रहे हैं।।
तन धन से तुम दुखी हो, परिवार से दुखी हो।
जिनको मिला है सब कुछ, वह भी तो रहे हैं।।
माना कि सारे दुख सुख प्रारब्ध से हैं मिलते।
पर देख लो तुझे, क्या गुरुदेव दे रहे हैं।।
जो हो न पास तेरे, वह भी तुम्हें वे देंगे।
पड़ जा शरण उन्हीं के, ले लो जो दे रहे हैं।।
लेगा न गर तू अबकी, पछताना फिर पड़ेगा।
पछताते सामने से, कितने ही जा रहे हैं।।
सोते ही बालेपन को, तुमने बिताया अपने।
अब तो जा रही जवानी, सब खोते जा रहे हैं।।
ऐसे जन्मते मरते, युग कितने हैं बिताया।
धन धाम पुत्र कितने, तोहि छोड़े जा रहे हैं।।
 कोई हो सका न तेरा, तू भी नहीं किसी का।
धोखे भरम के चक्कर में फंस के मर रहे हैं।।
सतगुरु तुम्हारे दर पर भी आ तुम्हें जगाते।
पर आप मोह निन्द्रा में सोते जा रहे हैं।।
अब भी तो उठ के अपनी जीवन पहेली समझो।
गुरुदेव प्यारे सतगुरु, तुमको बुला रहे हैं।।

(8) बज रहा काल का डंका, कोई बचने न पायेगा

 

बज रहा काल का डंका, कोई बचने न पायेगा। टेक
बचेगा साधु जन कोई, जो सत से लव लगायेगा।
बचेंगे सत्य का डंका है जिसने हाथ गह पकड़ा।
काल विश्वास धाती और झूठों को चबायेगा।
बचेंगे वे जो पर उपकार में तन धन लगायेंगे।
बचेगा अब न अन्यायी, जो जीवों को सतायेगा।
आज वह एक भी, उस काल के मुख से, न बच सकता।
दीन जीवों की खलड़ी नोच कर खाया जो खायेगा।
मांस खोरों व मदिरा पान करने वालों सुन लेना।
तुम्हारा मांस अब कोई गीध कौवे न खायेगा।
बचेंगे वे भरोसा जिनको मेहनत की कमाई का।
बचेगा वह नहीं हक गैर का जो छीन खायेगा।
बचेगा साधु जिसने इन्द्रियों को साध रखा है।
बहिर मुख इन्द्रियों का दास, अपना सब लुटायेगा।
बचेगा वह शरण पूरे गुरु की, जिसने ले रखी।
दया सागर मेरे गुरुदेव अब मुझको बचा लेना।
बचाने वाला पाकर क्यों भटकने कोई जायेगा। टेक

(9) गुरुदेव मेरी नैया, उस पार लगा देना

 

गुरुदेव मेरी नैया, उस पार लगा देना।
अब तक तो निभाया है, आगे भी निभा देना।
संभव है झंझटों में, मैं तुमको भूल जाऊँ।
पर नाथ दया करके, मुझ को न भुला देना।
दल बल के साथ माया, घेरे जो मुझे आकर।
तुम देखते ना रहना, झट आ के बचा लेना।
तुम देव मैं पुजारी, तुम इष्ट मैं उपासक।
चरणो तें पड़ा तेरे, हे! नाथ निभा लेना ॥

(10) गुरु बचालोगे जिसको वो बच जायेगा

 

गुरु बचालोगे जिसको वो बच जायेगा। फेर लोगे नजर तो वह फंस जायेगा।।
तेरी नजरों में कोई करामात है, हर समय होती अमृत की बरसात है।
उसको बिरला ही कोई समझ पायेगा, गुरु बचालोगे जिसको वो बच जायेगा। 01
वो दया दृष्टि जिस पर भी हो जायेगी, भाग्य उसकी तत्क्षण सुधर जायेगी।
व सुफल उसका नर तन भी हो जायेगा, गुरु बचालोगे जिसको वो बच जायेगा। 02
बन चुका भार कोई हो संसार का, फेर ली हो नजर जिससे सब प्यार का।
सब तरफ का भी हारा संभल जायेगा, गुरु बचालोगे जिसको वो बच जायेगा। 03
तन में शक्ति नहीं धन भी रत्ती नहीं, धर्म की भी तरफ भाव भक्ति नहीं।
मन दुराचार में भी जो रम जायेगा, गुरु बचालोगे जिसको वो बच जायेगा। 04
जिसको तेरे सिवा और कोई नहीं, रात दिन तेरी भक्ति में सोया नहीं।
अंग संग उसके तब तू ही हो जायेगा, गुरु बचालोगे जिसको वो बच जायेगा। 05
जो नजर तेरी नजरों में डाले खड़ा, धन्य वह हो गाया भाग्यशाली बड़ा।
उसका यमदूत कुछ भी ना कर पायेगा, गुरु बचालोगे जिसको वो बच जायेगा | 06
दीन दुखिया हूँ मैं तेरे द्वारे पड़ा, पाप से भर चुका है ये मेरा घड़ा।
जो किया है उसका वो फल पायेगा, गुरु बचालोगे जिसको वो बच जायेगा। 07
तेरे अतिरिक्त किसको पुकारुँ गुरु तेरी मूरत सूरत में उतारूँ प्रभु।
नाम नौका पे चढ़ दास तर जायेगा, गुरु बचालोगे जिसको वो बच जायेगा। 08
नाम तेरा मैं मुख से उचारुँ प्रभु अपने अंतःकरण में निहारुँ प्रभु।
दीप जलते ही सब पाप धुल जायेगा, गुरु बचालोगे जिसको वो बच जायेगा | 09
दीप के साथ ध्वनियां भी बजने लगीं, स्वर्ग बैकुण्ठ की रील चलने लगी।
देव भी ऐसे साधु का गुण गायेगा, गुरु बचालोगे जिसको वो बच जायेगा। 10
जय गुरु देव भगवान का नाम है, तुमको जो जान लेगा बना काम है।
देव मानव से भगवान हो जायेगा, गुरु बचालोगे जिसको वो बच जायेगा। 11
प्रभु बचालोगे जिसको वो बच जायेगा। फेर लोगे नजर तो वह फंस जायेगा।